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यूजीसी का नया नियम क्यों बना जनरल Vs OBC मुद्दा, 2012 से कैसे अलग, क्या हैं सवाल

नई दिल्ली. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर सड़क से सोशल मीडिया तक जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन भारत सरकार की वो संस्था है जो देश के कॉलेज व विश्वविद्यालयों पर नजर रखती है। यूजीसी ही इन विश्वविद्यालयों को मान्यता देती है। नियमों के उल्लंघन पर छीन भी लेती है। विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर कैसा होगा, शिक्षकों की योग्यता क्या होगी, किस शैक्षणिक संस्थान को सरकार से पैसा मिलेगा, यह सभी यूजीसी ही तय करता है। इसी यूजीसी ने हाल ही में प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्ट्यूशन रेगुलेशंस 2026 नाम का एक नया रेगुलेशन जारी किया है। यूजीसी का कहना है कि इसका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव से मिटाना है। लेकिन जनरल कैटेगरी यानी सवर्ण वर्ग के लोग इसे जनरल वर्ग विरोधी बता रहे हैं। सोशल मीडिया में #RollbackUGC ट्रेंड कर रहा है। कहा जा रहा है कि इन विनियमों से यूनिवर्सिटी और कॉलेज कैंपस में वातावरण और दूषित हो जाएगा। उनका कहना है ऐसा करके स्टूडेंट्स को बांटा जा रहा है। यूजीसी के नए नियमों को सामान्य बनाम अन्य वर्ग का मुद्दा बन गए हैं।

क्या है यूजीसी के नए नियम में

ओबीसी वर्ग को शामिल करने से बढ़ा बवाल

– यूजीसी के नए नियमों के अनुसार सभी शिक्षा संस्थानों को समानता अवसर केंद्र बनाने होंगे, जिनमें एससी-एसटी के साथ ओबीसी वर्ग के छात्र, कर्मचारी और शिक्षक भी अपने खिलाफ जातिगत आधार पर हो रहे भेदभाव की शिकायत कर सकते हैं। पहले के नियमों में केवल एससी-एसटी वर्ग के छात्र ही शामिल थे। ओबीसी वर्ग को इसमें शामिल करने से विरोध काफी तेज हो गया है। 2012 के यूीजीसी के नियमों में ओबीसी शामिल नहीं थे।

नए नियमों के तहत ओबीसी छात्रों और कर्मचारियों को उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायतें दर्ज करने का अधिकार दिया गया है, जिसे यूजीसी जमीनी हकीकत को दिखाने वाला एक सुधारवादी कदम बता रहा है।

– नियम के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को समानता समिति गठित करनी होगी जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

– शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और सख्त समय-सीमा होगी। शिकायत मिलने के 24 घंटे में कार्रवाई शुरू हो जाएगी और 60 दिनों में जांच पूरी करनी होगी। दोष साबित होने पर आरोपी के ख़िलाफ़ चेतावनी, जुर्माना, निलंबन या निष्कासन जैसी कार्रवाई होगी।

क्या है जनरल कैटेगरी वालों का कहना, क्यों हो रहा विरोध

जनरल कैटेगरी वालों की मांग है कि इन नियमों को वापस लिया जाए। ये नियम आरोपों की जांच से पहले ही जनरल कैटेगरी के छात्र को दोषी मान रहे हैं। इसके जरिए उन्हें झूठी साजिशों में आसानी से फंसाया जा सकता है। जनरल कैटेगिरी यानी सवर्ण समुदाय के लाखों लोगों का कहना है कि इससे समाज में भेदभाव और बढ़ेगा और इस कानून का इस्तेमाल जनरल कैटेगिरी के खिलाफ एक हथियार की तरह होगा। जबकि दूसरा पक्ष दलील दे रहा है कि जब आप जातिगत भेदभाव नहीं करते हैं तो डर क्यों रहे हैं?

– ये नियम बदले की कार्रवाई का जरिया बन सकते हैं।

– बिना किसी सबूत के झूठे आरोप लगाये जा सकते हैं।

– भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।

– इक्विटी कमिटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि को जरूरी नहीं बताया गया है।

– झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई न करने का प्रविधान भी है।

– झूठी शिकायतों से करियर बर्बाद होने का खतरा भी है।

– नए नियमों में ‘झूठी शिकायतों’ को हतोत्साहित करने वाले 2012 के पुराने प्रावधान को हटा दिया गया है।

क्यों लाने पड़े ये नियम?

सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों की सुनवाई के दौरान यूजीसी को भेदभाव रोकने के लिए सख्त नियम बनाने को कहा था। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला और मुंबई मेडिकल कॉलेज की पायल तड़वी ने कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद खुदकुशी कर ली थी। इसके बाद उनकी माताओं ने जनहित याचिका डाली थी। कोर्ट ने यूजीसी से कहा था कि 2012 के पुराने नियमों को अपडेट करें और भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाएं। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जनवरी 2025 में दिया था। फिर फरवरी 2025 में एक ड्राफ्ट जारी किया गया था।

कौन सी रिपोर्ट है इसके पीछे

यूजीसी के ये नियम जातिगत भेदभाव की बढ़ती शिकायतों के चलते लाए गए हैं। आयोग की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 2019-20 में भेदभाव की 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। पांच वर्षों में कुल 1160 शिकायतें सामने आईं, यानी करीब 118 प्रतिशत की वृद्धि। हालांकि आंकड़ों का दूसरा पक्ष भी है। 2023-24 में देश में 1153 विश्वविद्यालय और 48 हजार से ज्यादा कॉलेज थे, जहां 4 करोड़ 20 लाख से अधिक छात्र पढ़ रहे थे।

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